
ॐ
जय श्री कृष्णहिन्दी अनुवाद
मन इन्द्रियाँ न जीती हों जिसने,
उस अयुक्त की बुद्धि स्थिर नहीं रहती,
जिससे भावना नहीं, और भावहीन को शांति नहीं मिलती,
और सत् है सखे ! अशांत मन में सुख की नहीं चलती . अ. 2 श्ल. 66
आगे
इन्द्रियाणां हि चरताम यन्मनोनुविधियते.
तदस्य हरती प्रज्ञां वयुर्नावमिवाम्भसी..
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 67

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