Tuesday, June 30, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण

हिन्दी अनुवाद -

यज्ञ से बचे अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ,
सब पापों से मुक्त हो जाते,
परंतु जो मात्र अपने पोषण को पकाते,
वे तो बस पाप ही खाते. अ. 3 श्ल. 13

आगे -

अन्नद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवह.
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः..

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 14

Monday, June 29, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


यज्ञ द्वारा बढ़ाए तुम्हारे ये देवता,
तुम्हें बिन मांगे इच्छित भोग देंगे,
परंतु जो देवताओं को कुच्छ नहीं चढ़ाता,
स्वयं भोगता है वह निश्चय चोर ही होंगे.अ.3 श्ल. 12


आगे -


यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिशैः.
भुंजंते ते त्वघं पापा ये पचान्त्यात्मकारणात..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 13

Sunday, June 28, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


तुम करो उन्नत इन देवताओं को,
और ये देवता तुम्हारी तरक्की करें,
इसी तरह एक दूसरे को उन्नत करो,
और ये पथ तुम्हारा कल्याण करें.अ.3 श्ल. 11


आगे -


इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः.
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो बुनक्ते स्तेन एव सः..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 12

Saturday, June 27, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


काल शुरू में यज्ञ और,
प्रजा को रचकर ब्रह्माजी तब बोले,
तुम सब ये यज्ञ करो और,
वृद्धि पाओ ये किस्मत द्वार सब खोले,
ये यज्ञ तुम्हें सब दे और,
दे इच्छित भोगों के भर भर झोले. अ. 3 श्ल. 10


आगे -


देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः.
परस्परम् भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 11

Friday, June 26, 2009

जय श्री कृष्ण



जय श्री कृष्ण

हिन्दी अनुवाद -

यज्ञ के निमित्त न कर,
अन्यत्र कर्मों में बंधे इंसान,
कौन्तेय आसक्तिरहित होकर ,
तू ये अपना परमधर्म मान,
कि विष्णु या यज्ञ के निमित्त ही,
भक्तिसहित कर्म् करना पहचान. अ. 3 श्ल. 9

आगे -

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः.
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक..

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 10

Thursday, June 25, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


तू कर कर्म शास्त्रविहित,
न कर्म करने से कर्म करना है महान,
कर्म न करने से,
शरीर निर्वाह भी न होगा ये जान.अ. 3 श्ल. 8


आगे -


यज्ञार्थात्कर्मनोअन्यत्र लोकोअयं कर्मबन्धनः.
तदर्थं करम कौन्तेय मुक्तसंगह समाचर..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 9

Wednesday, June 24, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


जो मन से करे,
इंद्रियों पे काबु,
अनासक्त हो करे,
कर्मयोग लागु,
कर्मेन्द्रियों से जो ये करे,
वही श्रेष्ठ है साधु, अ. 4 श्ल. 7


आगे -


नियतम कुरु कर्म त्वम् कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः.
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धएदकर्मणः..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 8

Tuesday, June 23, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


इंद्रियों को विषयों से,
जो जोर लगाके रोकता है,
पर हरदम सोचे उनके बारे में,
वह मूढ़ , झूठा और दंभी है. अ. 3 श्ल. 6


आगे -


यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेअर्जुन.
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 7

Monday, June 22, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


सत तो ये है की कोई,
न रह सके बिना कर्मों के कभी ,
क्यों की कर्म करें अवश्,
प्रकृति के अधीन होके सभी. अ. 3 श्ल. 5


आगे -


कर्मेन्द्रियाणी संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन.
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 6

Sunday, June 21, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री क्रिष्ण


हिन्दी अनुवाद -


मानव कर्मों को छोड़,
न बनें कर्मयोगी,
न सब त्याग कर,
बने ज्ञानयोगी. अ. 3. श्ल. 4


आगे -


न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत.
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 5




Saturday, June 20, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


भगवन बोले हे निष्पाप सुनो लोक मे,
दो ही निष्ठा कही गई हैं मुझ से,
सांख्ययोग की ज्ञान योग से,
और योग की कर्मयोग से. अ.4 श्ल. 3


आगे -


न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्मयम् पुरुशोश्नुते.
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 4

Friday, June 19, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


एक बात कहो निश्चय से,
मिले हुए से वचनों से मोहित हूँ,
इसलिए बस वो बात कहो ,
जिससे मैं अपना भला कर सकूँ. अ. 3 श्ल. 2


आगे -


श्रीभगवानुवाच
लोकेस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ.
ज्ञानयोगेन सांख्यानाम कर्मयोगेन योगिनाम्..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 3

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


अर्जुन बोला - हे जनार्दन,
यदि ज्ञान श्रेष्ठ है कर्मों से,
तो क्यों लगाते हो केशव,
मुझे भयंकर कर्मों में. अ. 3 श्ल. 1


आगे


व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे.
तदेकं वद निश्चित्य एन श्रेयोहमाप्नुयाम..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 2

Thursday, June 18, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


हे पार्थ ! ब्रह्म को प्राप्त योगी की स्थिति है ये,
जिसे पाकर कभी मोहित नहीं होता योगी,
अंतकाल में भी इसमें स्थित होकर,
ब्राह्मानन्द को पा जाता है योगी. आ. 2 श्ल. 72


आगे -


अथ तृतीयो अध्यायः


ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन.
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 1

Wednesday, June 17, 2009

जय श्री कृष्ण

जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


त्याग दी सब कामनाएँ,
ममता रहित, अहंकार रहित, स्पृहारहित हुआ,
विचरे वश में कर सब आए,
बस वही शांति को प्राप्त हुआ. अ. 2 श्ल. 71


आगे -


एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति.
स्थित्वास्यामन्तकालेपि ब्राह्मनिर्वाणम्रुच्छति..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 72

Tuesday, June 16, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


जैसे नाना नदियों के जल,
एक समुन्द्र में समा जाते,
वैसे भोग अनेक मिलकर भी,
स्थितप्रज्ञ को नहीं हिला पाते,
सब और भरे अचल प्रतिष्ठित,
समुन्द्र नहीं विचलित होते,
ऐसे स्थिर पुरुष भोगों में,
परम शांत को ही पाते. अ. 2 श्ल. 70


आगे


विहाय कामान्यः सर्वान्पुमान्श्चरति निःस्पृहः.
निर्ममो निरहन्कारः स शान्तिमधिगच्छति..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 71

Monday, June 15, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


जहाँ रात्रि में सब सो जाएँ,
वहाँ ज्ञानी की सुबह हो जाए,
जहाँ प्राणी उठ जग जाएँ,
ज्ञानी देखे रात के साए. अ.2 श्ल. 69


आगे


आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठम समुन्द्रमापः प्रविशन्ति यद्वत.
तद्वत्कामा यम प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 70

Saturday, June 13, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


इन्द्रियाँ जिसकी , इंद्रियों के विषयों से, सब प्रकार वश में हुई हैं,
इन्द्रियाँ सुलझी उसकी,महाबाहो ! समझ उसीकी बुद्धि स्थिर है. अ. 2. श्लो. 68


आगे


या निशा सर्वभूतानाम तस्यां जागर्ति संयमी.
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 69

Friday, June 12, 2009

जय श्री कृष्ण

जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद -


जल में जैसे नाव को,
तेज हवा भटकाय,
वैसे ही भटकते मन की दशा,
देख कृष्ण बतलाए ..
विषयों में विचरती इंद्रियों में,
मन जिसके साथ लग जाय,
बस एक इंद्रिय प्रयत्न करते अयुक्त की,
बुद्धि हर ले जाय . अ. 2 श्ल. 67


आगे -


तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः.
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 68

Thursday, June 11, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


मन इन्द्रियाँ न जीती हों जिसने,
उस अयुक्त की बुद्धि स्थिर नहीं रहती,
जिससे भावना नहीं, और भावहीन को शांति नहीं मिलती,
और सत् है सखे ! अशांत मन में सुख की नहीं चलती . अ. 2 श्ल. 66


आगे


इन्द्रियाणां हि चरताम यन्मनोनुविधियते.
तदस्य हरती प्रज्ञां वयुर्नावमिवाम्भसी..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 67

Wednesday, June 10, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


अंतःकरण की प्रसन्नता पाकर,
दुःख सारे दूर दूर भागें,
प्रसन्न कर्मयोगी सबसे ध्यान हटाकर,
तब परमात्मा में ही लागे. अ. 2 श्ल. 65


आगे


नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना.
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखं..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 66

Tuesday, June 9, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


अपने अधीन अंतःकरण जिसका रहता है,
अपनी राग द्वेष रहित, वश में की,
इंद्रियों के साथ जो विचरता है,
अन्तःकरण की प्रसन्नता को ही प्राप्त करता है. अ. 2 श्ल. 64


आगे


प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योप्जायते.
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 65

Monday, June 8, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


क्रोध से बड़े मूढ़ भाव,
मूढ़ भाव से स्मृति भ्रम व भास ,
स्मृति भ्रम से हो बुद्धि नाश,
बुद्धि नाश से होवे विनाश. अ.2 श्लो. 63


आगे


रागद्वेषवियुक्तेस्तु विश्यानिन्द्रियैश्चरन.
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छती..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 64

Sunday, June 7, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


विषयों में विचरते,
की होवे उनमें सक्ति,
ध्यान करते करते,
हो जाए आसक्ति,
इससे उपजे कामना,
पाने की हर युक्ति,
जो न पूरी होने से,
निश्चित क्रोध उत्पत्ति. अ. 2 श्ल. 62


आगे


क्रोधाद्भवति समोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः.
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशत्प्रनश्यति..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 63

Saturday, June 6, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


तो हे अर्जुन साधक को चाहिए,
मेरा ध्यान करता रहे,
और वश में करले सब इन्द्रियाँ,
तब हि बुद्धि ये स्थिर रहे. अ.2 श्ल. 61


आगे


ध्यायतो विषयान पुंसः सन्गस्तेशुप्जायते.
सन्गात्सन्जायते कामः कामात्क्रोधोभिजायते..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 62

Friday, June 5, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


आसक्ति का नाश न हो तो,
उद्यत करने वाली इन्द्रियाँ,
यत्न करते पुरुष की भी,
बुद्धि हर लें ये बिजलियाँ. अ.2 श्ल. 60


आगे


तानि सर्वानि संयम्य युक्त आसीत् मत्परः.
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 61.

Thursday, June 4, 2009

जय श्री कृष्ण




जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


इंद्रिय विषय को ग्रहण न करने वाले के,
विषय तो निवृत हो जाते हैं परंतु,
उनमें रहने वाली आसक्ति नहीं मिटती,
परंतु इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की आसक्ति भी,
परमात्मा का साक्षात्कार करके नहीं टिकती. अ. 2 श्ल. 59


आगे


यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः.
इन्द्रियानि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभम् मनः..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 60

Wednesday, June 3, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


जैसे कछुवा समेटे अंगों को,
ऐसे समेट इन्द्रियाँ जतन से,
अपने विषयों से और इस मन से,
स्थिर होगी तब बुद्धि लगन से. अ. 2 श्ल. 58


आगे


विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः.
रसवर्जं रसोप्यस्य परम दृष्ट्वा निवर्तते..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 59

Tuesday, June 2, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


जो बुद्धि सर्वत्र स्नेह्रहित है,
शुभ अशुभ में सम रहती है,
न प्रसन्न न द्वेष करती है,
वही बुद्धि स्थिर रहती है. अ. 2 श्ल. 57


आगे


यदा संहरते चायं कुर्मोअन्गनीव सर्वशः.
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 58

Monday, June 1, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


दुःख से जिसे उद्वेग न हो,
सुख से भी निःस्पृह है जो,
राग, भय, क्रोध नहीं,
मुनि एक स्थिरबुद्धि वही. अ. 2 श्ल. 56


आगे


य: सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् .
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 57