हे पार्थ !
वे भोगों में तन्मय,
कर्मफल के प्रशंसक वेद वाक्य जो मानें,
जिन्हें स्वर्ग ही परम,
जिनके करम अच्छा जन्म, भोग, ऐश्वर्य ही सत्य जाने, अ. 2 श्ल. 42-43
आगे
भोगेश्वर्यप्रसक्तानां तयापह्रतचेतसाम्.
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते..
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 44


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