Sunday, June 7, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


विषयों में विचरते,
की होवे उनमें सक्ति,
ध्यान करते करते,
हो जाए आसक्ति,
इससे उपजे कामना,
पाने की हर युक्ति,
जो न पूरी होने से,
निश्चित क्रोध उत्पत्ति. अ. 2 श्ल. 62


आगे


क्रोधाद्भवति समोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः.
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशत्प्रनश्यति..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 63

Saturday, June 6, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


तो हे अर्जुन साधक को चाहिए,
मेरा ध्यान करता रहे,
और वश में करले सब इन्द्रियाँ,
तब हि बुद्धि ये स्थिर रहे. अ.2 श्ल. 61


आगे


ध्यायतो विषयान पुंसः सन्गस्तेशुप्जायते.
सन्गात्सन्जायते कामः कामात्क्रोधोभिजायते..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 62

Friday, June 5, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


आसक्ति का नाश न हो तो,
उद्यत करने वाली इन्द्रियाँ,
यत्न करते पुरुष की भी,
बुद्धि हर लें ये बिजलियाँ. अ.2 श्ल. 60


आगे


तानि सर्वानि संयम्य युक्त आसीत् मत्परः.
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 61.

Thursday, June 4, 2009

जय श्री कृष्ण




जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


इंद्रिय विषय को ग्रहण न करने वाले के,
विषय तो निवृत हो जाते हैं परंतु,
उनमें रहने वाली आसक्ति नहीं मिटती,
परंतु इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की आसक्ति भी,
परमात्मा का साक्षात्कार करके नहीं टिकती. अ. 2 श्ल. 59


आगे


यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः.
इन्द्रियानि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभम् मनः..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 60

Wednesday, June 3, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


जैसे कछुवा समेटे अंगों को,
ऐसे समेट इन्द्रियाँ जतन से,
अपने विषयों से और इस मन से,
स्थिर होगी तब बुद्धि लगन से. अ. 2 श्ल. 58


आगे


विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः.
रसवर्जं रसोप्यस्य परम दृष्ट्वा निवर्तते..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 59

Tuesday, June 2, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


जो बुद्धि सर्वत्र स्नेह्रहित है,
शुभ अशुभ में सम रहती है,
न प्रसन्न न द्वेष करती है,
वही बुद्धि स्थिर रहती है. अ. 2 श्ल. 57


आगे


यदा संहरते चायं कुर्मोअन्गनीव सर्वशः.
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 58

Monday, June 1, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण


हिन्दी अनुवाद


दुःख से जिसे उद्वेग न हो,
सुख से भी निःस्पृह है जो,
राग, भय, क्रोध नहीं,
मुनि एक स्थिरबुद्धि वही. अ. 2 श्ल. 56


आगे


य: सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् .
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता..


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 57