
ॐ
जय श्री कृष्ण
अनुवाद -
व्यक्ति जो कर्मों और उनके फलों में आसक्ति से,
संसारी आसरे से रहित रहे,
परमात्मा में तृप्त हुआ सर्व कर्मों को करते भी,
कुच्छ नहीं करे. अ. 4 श्ल. 20
आगे -
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यॅक्तसर्वपारिग्रहः.
शारीरम् केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम..
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 21.
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