Friday, November 13, 2009

जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण
अनुवाद -
कर्म का स्वरूप भी जानो,
अकर्म का भी,
और विकर्म का भी जानो,
गहन कर्म की गति तभी. अ.4 श्ल. 17
आगे -
कर्मन्यकर्म य: पश्येद्कर्मनि च कर्म य:.
स बुद्धिमांमनुष्येषु स युक्त कृतसनकर्मकृत.
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 18

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