ॐजय श्री कृष्ण
सुन ले मेरे भारत ! जब जब भी इस धरती पर,
धर्म की हानि और अधर्म की वृध्दि होती है,
तब तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ इस पृथ्वी पर,
अर्थात साकार रूप में लोगों के सम्मुख मेरी उत्पत्ति होती है. अ. 4 श्ल. 7
आगे -
परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम्.
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे..
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 8

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